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Karam Parva 2020 : करम परब और फसल काट कर घर लाने के बाद मकर परब क्यों मानते है आखिर क्या है विधि , क्या है उदेश्य पढ़े पूरी खबर…

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Karam Parva 2020 : करम परब और फसल काट कर घर लाने के बाद मकर परब क्यों मानते है आखिर क्या है विधि , क्या है उदेश्य पढ़े पूरी खबर…

  • भारत एक कृषि प्रधान देश है और धान की खेती के बाद इस क्षेत्र मे करम परब मनाया जाता है। जैसा नाम से ही पता चलता है।
  • भारत विविधताओं का देश है। यहां विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न प्रकार के जातियां एवं संस्कृति पाई जाती है।

NEWSTODAYJ धनबाद(ब्यूरो रिपोर्ट) : भारत विविधताओं का देश है। यहां विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न प्रकार के जातियां एवं संस्कृति पाई जाती है। भारत के पूर्वी क्षेत्र विशेषकर छोटा नागपुर, संथाल परगना, मानभूम, कोल्हान, जंगलमहल सहित झारखंड, बंगाल, उड़ीसा, असम आदि क्षेत्रों में करम परब विशेष रूप से मनाया जाता है।

अति प्राचीन काल से ही अनेक सांस्कृतिक हमलों के बाद भी इन क्षेत्रों में निवास करने वाले आदिवासी – मूल वासियों में आखाईन, बाहा, सिझानअ, गाजन, सरहुल, रहइन, जाताड़, करम, छाता, जितिया, जिहुड़, बांदना और टुसू जैसे पर्व त्योहार मनाया जाता है। इन पर्व त्योहारों के माध्यम से यहां के संस्कृति, दर्शन, जीवन शैली आदि गीत, संगीत के माध्यम से समेटे हुए हैं।भारत एक कृषि प्रधान देश है और धान की खेती के बाद इस क्षेत्र मे करम परब मनाया जाता है।

जैसा नाम से ही पता चलता है “करम”।यानि कर्म की प्रधानता या कृषि के बाद का पर्व करम परब है। इस पर्व को आदिवासी और कृषक लोग काफी धूमधाम से मनाते है। कृषक लोग का रोपा डोभा होने पर करम परब और फसल काट कर घर लाने के बाद मकर परब मनाते है। इन दो महान सांस्कृतिक पर्व के पीछे 6 महीना का अंतर माना जाता है जैसा कि

गीत में है कि “जावे दे जावे दे आर छ वे मास…आवतो भादरअ मास आनबो घुराई…”आदिवासी संस्कृति में “बारह मासेक तेरह परब” में परम पर्व का विशेष स्थान है और यह परब भादों महीना के शुक्ल पक्ष के एकादशी को सम्पन्न होता है। करम परब मूलत: सृजन का प्रतीक है और इसे कृषि पद्धति के आविष्कार के स्मृति पर्व के रूप में भी देखा जाता है।

आदि काल से ही जब बीज बोया जाता है, उस पर हल्दी काजल देकर कीटों और बुरी नजर से बचाया जाता है, पानी दिया जाता है, पौधों को सेवा किया जाता है, खुशी में गीत और नृत्य किया जाता है। इस तरह से यह पर्व पूर्णत: प्राकृतिक और प्रकृति से आस्था,लगाव और प्रेम करने वालों का पर्व है।भादो एकादशी से पहले युवतियां नजदीक के नदी, तालाब, जोड़ियां आदि में स्नान करके करम डाली या टुपा में द्विपत्री शस्य बीज जैसे कुरथी, बिरही, घांघरा, चना, गेहूं, धान, मकई, सेम आदि से जावा बुनती है।

जिसे “जावा उठाना” कहते हैं। इसमें 9 दिन के जावा के लिए 9 तरह का बीज, 7 दिन के जावा लिए 7 तरह का बीज, और 5 दिन के जावा के लिए 5 तरह का बीज बोया जाता है। इसके बाद युवतियां गीत गाते हुए जावा को गांव के आखड़ा में लाया जाता है। फिर प्रतिदिन इस “करम आखड़ा” में सुबह – शाम युवतियां समुह में एक दुसरे का हाथ में हाथ डालकर गीत – नृत्य करके जावा को जगाती है।

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यह वैज्ञानिक दृष्टि से भी सिद्ध है कि गीत संगीत से पौधों में वृद्धि जल्दी होता है। फलत: 7 दिन में ही जावा काफी बढ़ जाती है। फिर एकादशी के दिन गांव के पाहन या महतो करम डाल को आखड़ा में स्थापित करते हैं और पूजा अर्चना के बाद करम डाली और करम डाल का रात भर जागरण किया जाता है। गांव के सभी स्त्री-पुरुष ढोल – मांदर के थाप पर नाचते गाते हैं-

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“आज रे करम गोसाई घारे दुवारे रे घारे दुवारे काइल रे करम गोसाई कास नदीक पार…..”

इसके बाद दूसरे दिन करम डाल एवं जावा का विसर्जन तालाब, नदी, जोड़ियां आदि में किया जाता है और बिसर्जन के बाद कुछ जावा को घर लाकर बहन भाई की कलाई में बांधती है।करम परम मुख्यतः भाई बहन के अटूट नैसर्गिक प्रेम का भी प्रतीक है। इसमें सभी करमती बहनें 7 दिन या 9 दिन तक कठोर नियम एवं अनुशासन का पालन करते हुए अपने भाई के लिए करम गोसाई से लंबी उम्र एवं उन्नति की प्रार्थना करती है एवं जावा के चारों ओर गीत गाकर परिक्रमा करते हुए प्रार्थना करती है…

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“दहांइ दहांइ करम गसाञ …दिहा आसिस गअ…भाई हामर बाढ़ोतो लाखों बरिश गो……”

इस दरमियान करमती बहनें मांसाहार को त्याग कर, हरी सब्जी नहीं खाकर, बालों को ठीक से सवारना है जिस युवतियों शादी हो जाती है वह भी करम परब में नइहर आने की आशा में रहती है कि नइहर आकर सखी सहेलियों संग करम खेलेगी।

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“आवलो भादरअ मास लागलि नइहर आस छोटअ देवरा….करम खेले जाबो नइहर…..”

साथ ही जिस युवतियों की नई नई शादी होती है उनको वर पक्ष द्वारा जावा डाली देनें का विधान है।जिसमें जावा डाली के साथ कपड़ा साजो श्रृंगार दिया जाता है। इस तरह से महान प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक त्यौहार संपन्न हो जाता है।

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