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अब सब की निगाहें 23 मई पर टिकीं हैं। क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…..

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पटना।

अब सब की निगाहें 23 मई पर टिकीं हैं। क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…..

(अनुभव की बात, अनुभव के साथ)
कन्हैया की जीत या हार के मायने।

पटना। 29 अप्रैल के मतदान के साथ ही बिहार के बेगूसराय संसदीय क्षेत्र का चुनाव संपन्न हो गया। अब सब की निगाहें 23 मई को होने वाली मतगणना पर टिकी हैं।

बिहार के बेगूसराय संसदीय क्षेत्र की चर्चा इस चुनाव में पूरे देश में रही। अनुमान के मुताबिक बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र ही एकमात्र लोकसभा क्षेत्र है,जहां देश के विभिन्न हिस्सों से हजारों की संख्या में फिल्म अभिनेता,अभिनेत्री,सामाजिक कार्यकर्ता,राजनेता,छात्र नेता और छात्र सभी कन्हैया कुमार के पक्ष में चुनाव प्रचार करने बेगूसराय पहुंचे।

भारतीय राजनीति में एक बात हमेशा से कही जाती रही है कि मात्र आरोप लगने से कोई अपराधी साबित नहीं होता। अफसोस,देश के उन तमाम लोगों की सोंच के लिए,जो आरोप लगने मात्र से कन्हैया कुमार के लिए ‘देशद्रोही’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं।

मामला अदालत में है और केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाली दिल्ली पुलिस घटना के वर्षों बीत जाने के बाद भी कन्हैया कुमार को देशद्रोही साबित करने का कोई ठोस साक्ष्य अदालत में प्रस्तुत नहीं कर सकी है। निश्चित रूप से देश के एक होनहार युवा के लिए अब ऐसे शब्द का प्रयोग बंद हो जाना चाहिए था।

कन्हैया कुमार पर और भी कई आरोप लगते रहे हैं,लेकिन इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता कि कन्हैया का बचपन अभाव में गुजरा है,कन्हैया कुमार ने अपनी मेहनत की बदौलत जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तक का सफर तय किया और करीब 30 वर्ष की उम्र होते-होते उसने देश के प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल कर ली।वहाँ वो छात्र संघ का अध्यक्ष रहा।कन्हैया एक बेहतरीन वक्ता है और अपने भाषणों में कन्हैया कुमार देश के सबसे निचले तबके के लोगों की समस्याओं के समाधान की बात करता है।देश में धार्मिक और सामाजिक समानता की बात करता है।

चर्चा हो रही है,कन्हैया जीतेगा,कन्हैया हारेगा।मेरा मानना है कि जीत और हार से कन्हैया को अब बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ने वाला।क्योंकि कन्हैया कुमार ने अपनी सामाजिक और राजनैतिक जमीन तैयार कर ली है। आज नहीं तो कल उसे सफलता मिलेगी ही।लेकिन इस बात का अफसोस होगा यदि कन्हैया कुमार के अलावा बेगूसराय की जनता किसी और को चुनकर संसद भेजती है तो। आखिर उनकी राजनैतिक उपलब्धि क्या रही है ?

चाहे राजग के प्रत्याशी गिरिराज सिंह हों या महागठबंधन के प्रत्याशी तनवीर हसन। देश के समाज के या अपने क्षेत्र के ही विकास में दोनों का क्या योगदान रहा है,यह देखने वाली बात है। कन्हैया कुमार संसद नहीं पहुंचेगा इससे कन्हैया को बहुत फर्क नहीं पड़ता।

लेकिन समाज के और बेगूसराय के लोगों को इससे काफी फर्क पड़ने वाला है क्योंकि उनकी आवाज बुलंद करने वाला,समाज के सबसे निचले तबकों की आवाज बनने की क्षमता किसी और में नजर नहीं आती और ऐसे भी, स्वास्थ लोकतंत्र के लिए सत्ता पक्ष के साथ साथ मजबूत विपक्ष का होना भी जरूरी है।

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