CONVERSATION : रघुवर दास vs सरयू राय , पोल खोल , किताब मैनहर्ट घोटाले को लेकर , जनिए पूरा मामला…

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CONVERSATION : रघुवर दास vs सरयू राय , पोल खोल , किताब मैनहर्ट घोटाले को लेकर , जनिए पूरा मामला…

  • किताब मैनहर्ट घोटाले पर लिखी गई है, जिसमें पूर्व सीएम रघुवर दास पर सवाल उठाए गए हैं। पूर्व मुख्‍यमंत्री रघुवर दास ने इसका करारा जवाब दिया सरयू राय को।
  • रघुवर दास ने कहा आखिर बार-बार मैनहर्ट का मुद्दा उठाकर श्री राय क्या बताना चाहते हैं? किस बात को लेकर उन्हें नाराजगी है? कहीं ओ.आर.जी. को दिया गया ठेका रद्द करने से तो वे नाराज नहीं है?

NEWSTODAYJ : रांची । झारखंड के पूर्व मुख्‍यमंत्री रघुवर दास और उनके कैबिनेट में मंत्री रहे सरयू राय एक बार फिर से आमने सामने हैं। पूर्व मंत्री सरयू राय की किताब ‘लम्‍हों की खता’ का लोकार्पण हुआ। यह किताब मैनहर्ट घोटाले पर लिखी गई है, जिसमें पूर्व सीएम रघुवर दास पर सवाल उठाए गए हैं। पूर्व मुख्‍यमंत्री रघुवर दास ने इसका करारा जवाब दिया है।

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रघुवर ने कहा कि सरयू राय की किताब मैनहर्ट पर आई है, जिसमें मेरे नाम का उल्लेख है। ऐसी स्थिति में झारखंड की जनता को सच जानने का अधिकार है। यह एक ऐसा मामला है, जिसे विधायक सरयू राय समय-समय पर उठाकर चर्चा में बने रहना चाहते हैं। उन्होंने पहले भी कई बार इस मुद्दे को उठाया है। जनता यह जानना चाहेगी कि आखिर बार-बार मैनहर्ट का मुद्दा उठाकर श्री राय क्या बताना चाहते हैं? किस बात को लेकर उन्हें नाराजगी है? कहीं ओ.आर.जी. को दिया गया ठेका रद्द करने से तो वे नाराज नहीं है?

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कोर्ट का आदेश सही नहीं था, तो अपील में क्‍यों नहीं गए
जिस मैनहर्ट पर यह किताब है, वह मामला बहुत पुराना है। इसकी जांच भी हो चुकी है। सचिव ने जांच की, मुख्य सचिव ने जांच की, कैबिनेट में यह मामला गया। भारत सरकार के पास मामला गया। वहां से स्वीकृति मिली। कोर्ट के आदेश के बाद भुगतान किया गया। तो क्या कोर्ट के आदेश को भी नहीं मानते हैं राय जी। क्या यह माना जाए कि सरकार से लेकर न्यायालय के आदेश तक, जो भी निर्णय हुए वह सब गलत थे और सरयू राय जी ही सही हैं! यदि उन्हें लगा कि कोर्ट का आदेश सही नहीं था तो वे अपील में क्यों नहीं गये? कोर्ट नहीं जाकर अब किताब लिख रहे हैं!

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मेरी छवि खराब करने की कोशिश यहां गौर करने की बात यह है कि जिस समय भारत सरकार ने इसे स्वीकृति दी, उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी और झारखंड में अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में भाजपा-झामुमो गठबंधन की सरकार थी। जिस समय कोर्ट के आदेश पर भुगतान हुआ उस समय न तो मैं मुख्यमंत्री था और ना ही मंत्री। जब मैं नगर विकास मंत्री था, उस समय मैनहर्ट के मामले में मैंने कमेटी बनवाई थी। उसके बाद की सरकारों ने इस पर फैसला लिया, तो मैं इसमें कहां आता हूं? सच यह है कि राय जी मेरी छवि धूमिल करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते हैं। यह किताब भी मेरी छवि खराब करने की नीयत से लिखी गई है। इस पूरे मामले को विस्तार से ऐसे समझा जा सकता है।

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क्या है विषय

मैनहार्ट का मामला रांची में सीवरेज-ड्रेनेज प्रणाली के निर्माण के लिए परामर्शी चयन के संबंध में उठाया गया था। इसके खिलाफ दो शिकायतें आई। एक में मोहम्मद ताहिर नाम से किसी व्यक्ति ने तथा दूसरी बी ईश्वर राव नाम के व्यक्ति ने की थी। यह अजीब संयोग था कि दोनों की शिकायत में लगभग सभी शब्द एक समान थे। इसे देखकर साफ जाहिर हो रहा था कि संभवत: दोनों शिकायतें किसी एक व्यक्ति द्वारा विद्वेष या किसी गलत मंशा के तहत लिखवाई गई है। इसके बाद मोहम्मद ताहिर के द्वारा माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष पीआइएल दायर की गई और कार्रवाई की मांग की गई। माननीय उच्च न्यायालय ने मामले को निष्पादित करते हुए, उन्हें अपनी शिकायत निगरानी में करने के लिए निर्देशित किया।

उच्च न्यायालय ने मैनहार्ट को भुगतान करने का आदेश पारित किया था।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2010 में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा उपरोक्त आदेश पारित किए जाने के बाद भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के द्वारा प्रारंभिक जांच के उपरांत रिपोर्ट समर्पित की गई। इस बीच परामर्शी कंपनी मैनहार्ट द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई। माननीय उच्च न्यायालय के द्वारा उसमें समेकित तौर पर सुनवाई करते हुए कंपनी को भुगतान करने का आदेश दिया। यह आदेश 25-04-2011 को दिया गया। यहां उल्लेखनीय है कि जब यह मामला माननीय न्यायालय में लंबित था, तब भी मोहम्मद ताहिर के मामले पर निगरानी विभाग की जांच चल रही थी। माननीय उच्च न्यायालय में यह विषय भी लाया गया। बहरहाल पूरी सुनवाई के बाद माननीय न्यायालय ने मैनहार्ट को भुगतान करने का आदेश पारित किया था।

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माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के अवलोकन व निगरानी विभाग द्वारा समर्पित की गयी जांच रिपोर्ट के उपरांत तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की सरकार ने मैनहार्ट को भुगतान किए जाने का आदेश पारित किया था। उस समय वित्त मंत्री के तौर पर उप मुख्यमंत्री के रूप में हेमंत सोरेन पद पर थे और उस दौरान मैं सरकार में नहीं था। उक्त आदेश में यह स्पष्ट तौर पर भी आदेशित किया गया कि निगरानी विभाग द्वारा अन्य जांच की आवश्यकता नहीं है एवं नगर विकास विभाग के द्वारा संबंधित विषयों पर निर्णय लिया जायेगा। तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा पारित आदेश द्रष्टव्य है।

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निगरानी विभाग के अभियंत्रण कोषांग ने मुख्यत: वही त्रुटियां तकनीकी मूल्यांकन में बताई है जो विधानसभा की क्रियान्वयन समिति के द्वारा कही गई थी। विधानसभा की जांच समिति जिसमें 7 सदस्य थे तथा वित्त आयुक्त (क्रमश: राहुल सरीन और मुख्तियार सिंह) की अध्यक्षता में गठित समिति ने अपने प्रतिवेदन दिए हैं, किंतु तकनीकी मूल्यांकन इन समितियों के स्तर से नहीं किया गया। तकनीकी मूल्यांकन का कार्य तकनीकी उपसमिति ने किया और विधानसभा की समिति की रिपोर्ट आने के बाद विभाग द्वारा गठित उच्च स्तरीय तकनीकी समिति ने उसे जांचा।निर्णय समितियों के द्वारा नहीं अपितु नगर विकास विभाग या राज्य सरकार द्वारा लिये गये। कालांतर में मुख्यमंत्री के आदेश से पांच अभियंता प्रमुखों की समिति गठित की गई, जिसमें से चार ने यह माना कि मैनहार्ट की वित्तीय क्षमता कार्य के योग्य प्रतीत होती है, इसमें निगरानी विभाग के अभियंता प्रमुख का भी यही मत था।क्रियान्वयन समिति की रिपोर्ट के बाद भी विभाग के द्वारा परामर्शी को भुगतान किया गया।

(फिर भी यदि विभाग चाहे तो तकनीक उप समिति तथा उच्च स्तरीय तकनीकी समिति के सदस्यों से स्पष्टीकरण पूछकर प्रशासनिक कार्रवाई कर सकता है।)

इस मामले में न्यायालय में कोई भी शपथ पत्र मुख्य सचिव तथा विद्वान महाधिवक्ता की सहमति से दायर किया जाये। अब कार्रवाई निगरानी विभाग को नहीं अपितु नगर विकास नगर विकास विभाग को ही करनी है जैसा मुख्य सचिव ने कहा है। मंत्रिपरिषद से पारित योजना का अनुपालन होना चाहिए अन्यथा इस बारे में यदि कोई अतिरिक्त क्लेम अथवा Cost-escalation होता है तो कौन उत्तरादायी होगा? संपूर्ण रांची शहर में सीवरेज-ड्रेनेज सिस्टम का निर्माण, आवश्यकता हो तो विभिन्न चरणों में, शीघ्र किया जाना चाहिए जैसा विभाग की समीक्षा बैठक में निर्णित हुआ था।

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10 वर्षों से भ्रष्टाचार का मामला बताकर आम जनता को गुमराह करने एवं उनकी आंखों में धूल झोंकने का काम करते रहे हैं !यह भी स्पष्ट करना उचित होगा कि संबंधित मामला मंत्रिमंडल के समक्ष लाया गया और राज्य सरकार के संकल्प दिनांक 13-07-2011 तथा नगर विकास विभाग के पत्र दिनांक 17-10-2011 के द्वारा विषय पर एक स्पष्ट मंतव्य तथा निर्णय लिया जा चुका था। विचारणीय विषय है कि क्या सरयू राय जी को सन 2010-2011 में लिये गए निर्णयों तथा निगरानी विभाग की रिपोर्ट एवं मैनहार्ट मामले में पारित माननीय उच्च न्यायालय के आदेश अथवा मैनहार्ट को मंत्रिपरिषद के निर्णय से किए गए भुगतान अथवा तत्कालीन मुख्यमंत्री के आदेश के संबंध में जानकारी नहीं है? क्या सरयू राय जी इस मामले को विगत 10 वर्षों से भ्रष्टाचार का मामला बताकर आम जनता को गुमराह करने एवं उनकी आंखों में धूल झोंकने का काम करते रहे हैं।

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उन्हें माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के विषय में क्या कहना है और उक्त न्यायादेश को मानने या पालन करने की बजाय उसकी अपील नहीं किये जाने के विषय पर वे क्या कहते हैं, क्या वे यह कहना चाहते हैं कि माननीय उच्च न्यायालय के द्वारा दिया गया आदेश अनुचित था या फिर तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा या तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री हेमंत सोरेन ने विषय को समझा ही नहीं। सारी बातें सिर्फ उन्हें समझ आती हैं।

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जिस शासन तथा पार्टी का वे हिस्सा रहे, उसके विरूद्ध अनर्गल बातें करना उनका स्वभाव रहा है। सरकार की बातों को बाहर करना हो या पार्टी, प्रधानमंत्री व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को कोसना हो, उन्होंने कोई मौका नहीं छोड़ा। मैंने अपने कार्यकाल में राज्य के विकास के लिए दिन रात मेहनत की और राज्य को विकास के पथ पर ला खड़ा किया है। अफसोस है कि श्री राय ने सिर्फ इसलिए मेरा प्रतिकार करते रहे हैं कि संभवत: उन्हें मुझसे व्यक्तिगत और जातिगत विद्वेष है। भगवान उन्हें सुबुद्धि प्रदान करें, इससे अधिक मैं क्या ही कह सकता हूं।

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लेखक ने अपनी पुस्तक में बड़े सच को दबा दिया है। कुछ अनकही बातें, जो जाननी जरूरी हैं यथा-ओआरजी कंपनी का कार्यालय रांची में कहां से संचालित होता था?वे कौन लोग थे जो एक कंपनी विशेष की पैरवी मुझसे और अन्य महत्वपूर्ण जगहों पर करते थे?वह कौन लोग थे जो उस कंपनी को परामर्शी बनाने के लिए उससे लाभ उठाते थे, बदले में सरकार में कंपनी की पैरवी करते थे?सरकार बदलते ही मुझे निशाने पर रखकर बिना तथ्यों के आरोप लगाए गए और हर बार आरोप लगाने वाले गलत साबित हुए हैं। उदाहरण के लिए…विधान सभा चुनाव 2019 के दौरान यह आरोप लगाया गया कि ईवीएम हैक करने के लिए रांची में हैकर बुलाए गए हैं। सरकार ने तुरंत जांच कराई गई। आरोप गलत निकले। नेताओं के फोन टेप के आरोप की जांच करायी गयी और आरोप झूठ का पुलिंदा निकला। एक दूसरे आरोप में कहा गया कि स्पेशल ब्रांच और सीआईडी के ऑफिस में गोपनीय दस्तावेज जलाए जा रहे हैं। एडीजी मुख्यालय को जांच के लिए भेजा गया, परिणाम फिर गलत निकले। एक अन्य आरोप में कहा गया कि मुख्यमंत्री रहते मैंने अपने लिए चार करोड़ रुपये की बेंटले कार खरीदने का आर्डर दिया था। यह आरोप भी 100 प्रतिशत झूठ निकला।

परेशानी यह नहीं कि झूठे आरोप लगाए जाते हैं।

परेशानी है कि जो सबसे अधिक अनैतिक है, वह सबसे अधिक नैतिकता की बात करता है। हर दिन मंत्री पद से इस्तीफा देने की धमकी देने वाले ने कभी भी इस्तीफा ही नहीं दिया। एक व्यक्ति पद एवं गोपनीयता की शपथ लेकर मंत्री पद पर बैठता है और वही मंत्री गोपनीय बातों को मीडिया को ब्रीफ करता है। एक मंत्री का खुद का लिखा बफशीट किसी PIL की फाइल में मिले तो इसे शर्मनाक बात और क्या हो सकती है। यह कहां की नैतिकता है।

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