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संसदीय प्रजातंत्र की नींव डालने वाले थे पंडित जवाहरलाल नेहरू

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नई दिल्ली।

(पुण्यतिथि के अवसर पर विशेष )

संसदीय प्रजातंत्र की नींव डालने वाले थे पंडित जवाहरलाल नेहरू

नई दिल्ली। चुनाव समाप्त हो चुके हैं और नतीजे आ गए हैं। नतीजों से यह सिद्ध हो गया है कि हमारे देश में संसदीय प्रजातंत्र की नींव काफी मजबूत है। इस नींव को डालने में महान स्वतंत्रता सेनानी, चिंतक, लेखक एवं प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की महती भूमिका रही है।Image result for प्रथम आम चुनाव और जवाहरलाल नेहरू आज उनकी पुण्यतिथि (27 मई) के अवसर पर हम उनके योगदान को याद करें और इतिहास के उन पन्नों को पलटें जब जद्दोजहद के बीच प्रथम चुनाव हुआ था। उस चुनाव के दौरान नेहरूजी ने पूरे देश का सघन भ्रमण किया था और सैंकड़ों जनसभाओं को संबोधित किया था।

नेहरूजी ने लोकतंत्र की मजबूत नींव डालने के लिए जो अनेक निर्णय लिए उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण था वह निर्णय जिसके अंतर्गत उन्होंने हर वयस्क भारतीय, अर्थात जिसकी आयु 21 वर्ष अथवा उससे अधिक हो, को मताधिकार दिया। यह अधिकार इस तथ्य के बावजूद दिया गया कि उस समय 90 प्रतिशत भारतीय निरक्षर थे।
इस निर्णय से सारी दुनिया भौचक्की हो गई थी। यह शंका प्रकट की गई थी कि निरक्षर अपने मताधिकार का प्रयोग ठीक से नहीं कर पाएंगे। वे न तो उम्मीदवार का नाम पढ़ सकेंगे और ना ही उसकी पार्टी का।

चौतरफा विरोध के चलते नेहरू स्वयं चिंतित एवं आशंकित हुए किंतु अंततः अपने निर्णय पर कायम रहे। उन्होंनें चुनाव की तैयारी करने की जिम्मेदारी वरिष्ठ आईसीएस अधिकारी सुकुमार सेन को सौंपी। चुनावों का संचालन करने के लिए चुनाव आयोग का गठन किया गया और सेन को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। नेहरू चाहते थे कि चुनाव जल्द से जल्द हों।Related image

चुनाव संपन्न कराना एक अत्यधिक चुनौतीपूर्ण कार्य था। उस समय (सन् 1950 में) 21 वर्ष या उससे अधिक आयु के भारतीयों की संख्या लगभग 17 करोड़ थी। इनमें से लगभग 85 प्रतिशत पूर्णतः निरक्षर थे। उस दौरान एक अमरीकी विद्वान ने शंका प्रकट की थी कि चुनाव संपन्न कराना लगभग असंभव होगा। यह तय किया गया कि 500 प्रतिनिधि लोकसभा के लिए और लगभग चार हजार प्रतिनिधि राज्यों की विधानसभाओं के लिए चुने जाएंगे। मतदान के लिए 2,24,000 मतदान केन्द्र बनाए गए। इन मतदान केन्द्रों के लिए लोहे की 20 लाख मतपेटियों की जरूरत थी। इन पेटियों को बनाने के लिए 8,200 टन इस्पात की आवश्यकता थी। Image result for प्रथम आम चुनाव और जवाहरलाल नेहरूमतपत्र बनाने के लिए कागज की 3 लाख 80 हजार रीमों की जरूरत थी। मतदान केन्द्रों पर 56,000 प्रेसाईडिंग अधिकारियों व इनकी सहायता के लिए दो लाख अस्सी हजार क्लर्कों को भर्ती किया गया। निर्वाचन सुरक्षित ढ़ंग से संपन्न हों इसके लिए 2 लाख 24 हजार पुलिस जवानों की आवश्यकता थी।
चुनाव की तैयारियां पूरी होते ही जवाहरलाल नेहरू चुनाव प्रचार के लिए निकल पड़े। चुनाव प्रचार की यात्राएं हवाई जहाज, कार, ट्रेन, नाव और कहीं-कहीं बैलगाड़ी और घोड़े पर सवार होकर की गईं। एक मोटे अंदाज के अनुसार नौ सप्ताहों में नेहरू ने 25 हजार मील की यात्रा की।

नेहरूजी की पहली चुनावी सभा 30 सितंबर 1951 को पंजाब के लुधियाना शहर में हुई। इस जनसभा में नेहरू ने साम्प्रदायिक संगठनों पर जोरदार हमला बोला और चेतावनी दी कि जिस दिन ये साम्प्रदायिक ताकतें देश की सत्ता पर काबिज हो जाएंगी और अपने उद्देश्यों में सफल हो जाएंगी उस दिन पूरे देश में हाहाकार मच जाएगा और देश की एकता छिन्न-भिन्न हो जाएगी।Related image आज जब हम देखते है लोगों में राजनीतिक असहिष्णुता इतनी बढ़ती जा रही है कि अब लोग आपसी रिश्तों का भी ख्याल नहीं रखते तब हमें लगता है कि नेहरूजी की यह आशंका सच साबित तो नहीं हो रही है। पांच लाख से ज्यादा श्रोताओं को संबोधित करते हुए नेहरू ने कहा कि अपने दिमाग की खिड़कियां खुली रखें और हर तरह के विचारों के झोंकों को प्रवेश दें।
नेहरूजी का दूसरा महत्वपूर्ण भाषण दिल्ली में हुआ। गांधीजी के जन्मदिन पर आयोजित इस जनसभा में नेहरू ने घोषणा की कि उनका लक्ष्य देश से छुआछूत और सामंतवाद को समाप्त करना है। इस अवसर पर भी नेहरू ने साम्प्रदायिकता पर जोरदार हमला किया।Image result for the first general elections in india साम्प्रदायिकता को देश की एकता के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हुए उन्होंने कहा कि इसके विरूद्ध सामूहिक चेतना जागृत करना और उसे जड़-मूल से उखाड़ फेंकना आवश्यक है। उनके भाषण के दौरान बार-बार तालियां बजीं और उस समय तो तालियां लगातार काफी समय तक बजती रहीं जब उन्होंने अपनी आवाज ऊँची करते हुए कहा कि ‘‘यदि कोई व्यक्ति धर्म के नाम पर किसी पर हमला करता है तो ऐसे व्यक्ति और संगठन के विरूद्ध में अपनी अंतिम सांस तक लड़ूंगा – सरकार के मुखिया के रूप में और एक साधारण नागरिक की हैसियत से भी।‘‘

अपने चुनाव प्रचार के दौरान नेहरू लगभग प्रत्येक जनसभा में साम्प्रदायिकता के जहर के प्रति लोगों को आगाह करते थे। एक जनसभा में उन्होंने जातिवाद की भी सख्त शब्दों में भर्त्सना की। मध्यप्रदेश के बिलासपुर में उन्होंने वामपंथियों की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि समाजवादी समाज के निर्माण के लिए धैर्य की आवष्कता है। Related image
उनके चुनाव प्रचार के संबंध में एक पत्रकार ने लिखा था कि वे इस दौरान सोये कम और भ्रमण ज्यादा किया। उन्होंने 300 सभाओं में लगभग दो करोड़ लोगों को संबोधित किया। इसके अतिरिक्त लाखों लोगों ने सड़क किनारे खड़े होकर उनके दर्शन किए। उनके श्रोताओं में मजदूर, किसान, महिलाएं, मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग के लोग शामिल थे।

नेहरूजी के चुनाव प्रचार के बाद पूरे देश में चुनाव शांतिपूर्ण ढ़ंग से संपन्न हो गए। चुनाव की सफलता का संपूर्ण विश्व ने स्वागत किया। चुनाव के दौरान चेस्टर बाउल्स भारत में अमेरिका के राजदूत थे। उन्होंने चुनाव की सफलता पर शंका प्रकट की थी। उन्हें यह समझ में नहीं आता था कि निरक्षर मतदाता कैसे अपने जनप्रतिनिधि चुनेंगे। पर उनकी यह आशंका निर्मूल साबित हुई और उन्होंने अपनी भूल स्वीकारी।

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