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विकार अथवा दिव्य गुणों में कमी ही आत्मा की योग स्थिति अथवा योग-निष्ठा में बाधक होते हैं।

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रांची।

विकार अथवा दिव्य गुणों में कमी ही आत्मा की योग स्थिति अथवा योग-निष्ठा में बाधक होते हैं।

रांची। आज के खुशनुमा राजयोग सत्र में बोलते हुए ब्रह्माकुमारी राजयोगिनी निर्मला बहन ने कहा विकार अथवा दिव्य गुणों में कमी ही आत्मा की योग स्थिति अथवा योग-निष्ठा में बाधक होते हैं। योगी अपने ह्रदय रूपी आसन पर अपने प्राणों के पति परमात्मा को विराजमान करता है तथा श्वास-प्रश्वास में उस प्रियतम प्रभु की याद में तल्लीन रहता है। यह वातंे ब्रह्माकुमारी संस्थान चैधरी बगान, हरित भवन के सामने हरमू रोड, राॅची में प्रवचन करते हुए ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन ने कही। आपने कहा साधारण एवं निकृष्ट अभीष्ट हेतु स्वार्थ के लिए भीड़ एकत्र कर लेना कठिन नहीं है लेकिन जहाॅ त्याग, संयम, आत्म परिशोधन, परमात्म अनुभूति व स्वपरिवर्तन का अभीष्ट सामने आता है तब भीड़ तितर-बितर हो जाती है। आज विश्व परिवर्तन के संक्रमण काल से गुजर रहा है। शांति-कर्ताओं के प्रयासों के बीच महाविनाश के नगाड़े भी बज रहे हैं। ऐसे समय में शालीनता के साथ सम्पूर्ण बह्मचर्य, मन्नशुद्धि, नियमित सतसंग आध्यात्मिक चिंतन मनन द्वारा विचार मंथन कर श्रेष्ट जीवन निर्माण का जीवन्त उदाहरण प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय का ईश्वरीय प्रतिष्ठान ही है। किसी भी मत के अनुयायिओं की संख्या बढ़ जाना ही उसका उत्थान नहीं कहलाता, बल्कि देखने वाली बात यह है कि उनमें सैद्धांतिक परिपक्वता कितनी आयी है व साधना त्याग व पवित्रता कितनी बढ़ी है। सर्व समस्याओं का हल पवित्रता है। ब्रह्मचर्य एक प्रबल अस्त्र है। इस दिव्यास्त्र से समस्त आसुरीयता को समाप्त किया जा सकता है। लुप्त हुए आदि सनातन देवी देवता धर्म की स्थापना हेतु नयी स्वर्गिक व्यवस्था सृजन हेतु पतित पावन परमात्मा मातृशक्ति ब्रह्माकुमारी बहनों द्वारा जन समुदाय को ज्ञान प्रकाश से आलोकित कर रहे हैं। लाखों नर-नारियों में संयम, सन्तोष, पवित्रता आदि गुणों की खान भर उन्हें स्थितप्रज्ञ, कर्मयोगी, ध्यानस्थ, दिव्य सन्देशवाहक के रूप में परमात्मा ने बनाया है। एकाग्रता जिनका स्वरूप है, पवित्रता जिनका श्रृगांर है। हर्षितमुखता एवं अलौकिकता जिनकी आत्मा है, कल्याणकारी भावना जिनका संकल्प श्वांस है ऐसी लाखों लाख आत्माओं का जीवन परिवर्तन साक्षात् रूप में परमात्मा कर रहे हैं।

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