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रामगढ़ राज परिवार का कई चुनावों में रहा दबदबा

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रांची।

रामगढ़ राज परिवार का कई चुनावों में रहा दबदबा

रांची। अंग्रेजों से देशी को आजादी मिलने के वक्त पूरे भारत में कई सौ राजे-रजवाड़े थे। उनमें सबसे छोटा राजा एवं इस्टेट नागपुर खुर्द (छोटानागपुर) था। वर्ष 1368 से 1955 तक इस वंश के 19 राजाओं ने 587 वर्ष तक शासन रहा। रामगढ़ राज परिवार के रूप में विख्यात इस राज परिवार के अंतिम शासक राजा बहादुर कामाख्या नारायण सिंह हुए। देश को जब आजादी मिली और तो एकीकृत बिहार में पूरे छोटनागपुर इलाके में राजा कामाख्या नारायण सिंह का दबदबा रहा। एक समय ऐसा भी था, कि इस राजपरिवार का जिसे भी आशीर्वाद प्राप्त होता,उसे चुनाव में जीत मिल जाती थी।
राजा बहादुर कामाख्या नारायण सिंह पहले आम चुनाव 1952 से लेकर लगातार अपने जीवन के अंतिम क्षण 1970 तक विधानसभा के सदस्य रहे। कई चुनाव में कामख्या नारायण सिंह एक साथ कई क्षेत्रों से जीतने वाले एक एकाकी नेता था। स्वतंत्रता की लड़ाई में कामाख्या नारायण सिंह ने महात्मा गांधी का साथ दिया और रामगढ़ में ऐतिहासिक राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन भी कराया था तथा गांधीजी के चरणों में राज समर्पण की घोषणा की थी। इन्हें ब्रिटिश सरकार ने राजाबहादुर की उपाधि दी थी और 52 नाल बंदूक अपनी सुरक्षा के लिए ये रख सकते थे। कामाख्या नारायण सिंह आजादी मिलने के पहले तक कांग्रेस में रहकर जनजागरण में जुटे थे, लेकिन कहा जाता है कि कांग्रेस के तत्कालीन वरिष्ठ नेता जवाहर लाल नेहरू से जब वे एक बार मिलने गये थे, तो नेहरू ने उन्हें काफी देर इंतजार करवाया, जिससे क्षुब्ध होकर वे नेहरू से बिना मिले ही वापस लौट गये और 1946 में छोटानागपुर संताल परगना जनता पार्टी का गठन किया। बाद में 1960 में उन्होंने अपनी पार्टी का राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी में विलय कर दिया।

पुराने हजारीबाग जिले यानी चतरा, हजारीबाग, कोडरमा, गिरिडीह, रामगढ़ और बोकारो में जिस किसी को इस राजपरिवार का समर्थन मिला, वह चुनाव जीतने में सफल रहा। आजादी के पहले और बाद में जिस समय पूरे देश में कांग्रेस की तूती बोलती थी, उसके दिग्गज नेता राजा बहादुर कामाख्या नारायण सिंह के विरूद्ध कैंप करते थे, फिर भी ये चुनाव जीत जाते थे। उनका प्रभाव इतना था कि उनकी पार्टी के उम्मीदवार धनबाद सहित आरा और छपरा से भी चुनाव जीतते थे।

बिहार में 1962 तक उनकी पार्टी के सात सांसद हो गये और 50 विधायक के साथ राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता बने। 1967-68 में बिहार में जब पहली बार गैर कांग्रेसी दलों की सरकार बनी, तो राजा रामगढ़ की पार्टी की अहम भूमिका थी। उनके परिवार के ही भाई कुंवर बंसत नारायण सिंह, माताश्री शशांक मंजरी देवी, धर्मपत्नी ललिता राजलक्ष्मी, पुत्र टिकैट इंद्र जितेंद्र नारायण सिंह कई बार सांसद और विधायक बने। वहीं राजा बहादुर कामाख्या नारायण सिंह, कुंवर बसंत नारायण सिंह, ललिता राजलक्ष्मी बिहार सरकार में मंत्री बने। उनके सहयोग से चुनाव जीते कैलाशपति सिंह (हजारीबाग) और गोपीनाथ सिंह (रंका-पलामू) बिहार सरकार में मंत्री बन गये थे।

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