जान देंगे जमीन नहीं देंगे पर अड़े चिल्हों खुर्द के आदिवासी

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जान देंगे जमीन नहीं देंगे पर अड़े चिल्हों खुर्द के आदिवासी

  • क्रेशर खोलने के नाम पर सादे पेपर पर घर घर जा सब के दस्तखत और ठेपा ले लिए गए
  • क्रेशर नहीं माइंस का पता चलने पर जम कर विरोध कर खनन विभाग सहित तत्कालीन उपायुक्त को आवेदन दे लीज को निरस्त करने की मांग

NEWSTODAYJ – छतरपुर प्रखंड के हुल्सम पंचायत अंतर्गत चिलहों खुर्द गांव के सैकड़ों आदिवासी परिवारों के द्वारा रविवार के अहले सुबह एक बैठक की सूचना पर जब हमारी टीम गांव पहुंची। तो उग्र ग्रामीणों के द्वारा एक ही स्वर में नारा लगता पाया की जान देंगे जमीन नहीं देंगे, क्योंकि जमीन ही हमारी माता है और रोजी रोजगार, जीने खाने का एकमात्र जरिया भी। बता दे की उक्त गांव खरवार, चेरो जनजाति बहुल क्षेत्र है जहां के नबे फीसदी लोगो का मुख्य रोजगार किसानी है ।

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स्थल पर पहुंच जब हमने मामले को खंगालने की कोशिश की ये विरोध किस बात को लेकर है , तो पता चला कि गांव का करीब तीन एकड़ गैर मजरूआ पहाड़ी क्षेत्र को 2017 में लीज करवाया गया, पत्थर तोड़ने के लिए । जो कि छतरपुर के मुकेश सिंह व रेहला के अशोक सिंह के नाम है । ग्रामीणों का आरोप है पंचायत के है माया और मंटू साव के द्वारा उनके अनपढ़ होने का फायदा उठा तीन वर्षो पहले गांव में कहीं और क्रेशर खोलने के नाम पर सादे पेपर पर घर घर जा सब के दस्तखत और ठेपा ले लिए गए और बाद में इसे ग्राम सभा का नाम दे दिया गया।

बाद में जब क्षेत्र का सीमांकन होने लगा और इसकी जानकारी ग्रामीणों को हुई की जिस पर उन्होंने दस्तखत किया है वह क्रेशर नहीं माइंस है तो ग्रामीणों ने इसका जम कर विरोध किया और खनन विभाग सहित तत्कालीन उपायुक्त की आवेदन दे सारी बातो से से अवगत करा इस लीज को निरस्त करने की मांग की । साथ ही लोगो ने तत्कालीन बीडीओ के कार्य पर भी आरोप लगाते हुए बताया कि जब उपायुक्त के निर्देश पर 2018 में बीडीओ स्थल पर पहुंचे तो उन्होंने एक बार फिर इन लोगो के दस्तखत ये कह कर ले लिए की चार दिनों में लीज निरस्त कर दी जाएगी , लेकिन बाद में जानकारी हुई की उस दस्तखत वाले पेपर को ग्रामीणों का राजीनामा के तौर पर पेश कर दिया गया है।

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लगातार विरोध के बाद ये मामला ठंडे बस्ते में चला गया था और अब तक कोई कार्य शुरू नहीं किया गया था। लेकिन जब पिछले हफ्ते ग्रामीणों को एक नोटिस प्राप्त हुई तो जिसमे इसी महीने की बीस तारीख को सीमांकन करने की बाते कहीं गई थी तो एक बार फिर लोगो ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया, मामले को लेकर स्थानीय विधायक व पूर्व सांसद से भी मिले लेकिन वहा भी ग्रामीणों को इनके पक्ष में जवाब नहीं मिला।  अब अपने सामर्थ्य अनुसार सारे कानूनी प्रयासों के बाद जब ग्रामीणों को इनकी हक में फैसला नहीं मिला तो आज विवश आदिवासियों ने बैठक कर उग्र तरीके से होने वाले सीमांकन को रोकने के लिए रणनीति तैयार करने में जुट गए।

साथ ही ग्रामीणों के विरोध की मुख्य वजह ये सामने आई की लीज पहाड़ के बगल में आदिवासियों के पारम्परिक देवता का पूजा स्थल है , वहीं पर देवी मंडप भी है । व पहाड़ के नजदीक लोगो के घरों के साथ उनकी रैयती खेती की जमीन भी है । और यदि माइंस संचालित होती है तो सभी पूर्ण रूप से बर्बाद हो जाएंगे ।

क्या कहते है संबंधित भूमि के चौहदीदार

इस मामले पर हमने जब लीज भूमि के चौहड़ीदार मुकेश सिंह से बात की तो उनके मुताबिक उक्त जमीन पर लीज के बाद चार नामित व्यक्तियों के द्वारा रंगदारी की मांग करने के कारण पिछले दो वर्षो से कोई कार्य नहीं किए जाने की बात बताई , लेकिन पिछले ही दिनों जब उन्हें उस तीन एकड़ भूमि के रेंट को लेकर जब एक नोटिस प्राप्त हुआ जिसमें उन्हें एक लाख पचासी हजार के करीब सरकार को चुक्ता करने की बात कही गई जिस पर कोई खनन कार्य नहीं किया गया तो फिर इस संबंध में उन्होंने उपायुक्त को पत्र दे भूमि का सीमांकन करा कार्य चालू करने की आदेश देने या तो फिर निरस्त करने की मांग की , जिसपर संज्ञान लेते हुए इसी महीने को बीस तारीख को सीमांकन हेतु समय निर्धारित की गई ।

सीमांकन को लेकर सवाल पर अंचल पदाधिकारी राकेश तिवारी ने स्पष्ट किया कि संबंधित भूमि के लीज की अनुमति हमारे द्वारा नहीं दी गई है , आवेदक के आवेदन पर सिर्फ सीमांकन का समय दिया गया है उनके द्वारा । यदि ग्रामीणों का विरोध है तो संबंधित कार्यालय जहा से लीज ग्रांट हुआ है वहा आवेदन दे इसे निरस्त करने हेतु।

महगठबंधन की सरकार में किसी के साथ नहीं होगा अन्याय, आदिवासियों के अधिकारों का हनन ना हो ये सरकार की पहली प्राथमिकता । क्षेत्र में इस तरह से सभी फर्जी लीज माइंस मामले की निष्पक्ष जांच करा दोषी पर करवाई कराने कि मांग मुख्यमंत्री से कि जाएगी -पूर्व राजद विधानसभा प्रत्याशी विजय राम मामले की जानकारी मिली है यदि ऐसा हुआ है तो काफी गंभीर मामला है । और इस पर उच्च स्तरीय जांच करा क्षेत्र के आदिवासियों को न्याय दिलाने हेतु मुख्यमंत्री को पत्र लिखा जाएगा – पूर्व सांसद घुरण राम

बता दे की मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने के बाद जनवरी मे जनजाति दर्शन पर आयोजित हुए आदि दर्शन अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार में हेमंत सोरेन ने कहा था कि विकास के आधुनिक मॉडल ने आदिवासी और प्राकृतिक के रिश्ते के संतुलन को बिगाड़ दिया है । संसाधन के दोहन को लेकर ग्लोबल भूख से अधिकतर आदिवासियों को ही नुकसान पहुंचा है । अब ऐसी सोच के साथ कार्यकाल को शुरुआत कर चुके जेएमएम की सरकार में आदिवासियों के साथ ही अगर अन्याय हो तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं । जेएमएम की इतिहास भी आदिवासियों के हक में आंदोलन की ही रही है और इसी सोच से झारखंड बिहार के बटवारे में भी पार्टी प्रतिनिधियों कि अहम भूमिका रह चुकी है ।

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