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एकता के रंग में रंगना ही तो होली है- विवेक चौबे की कलम से

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एकता के रंग में रंगना ही तो होली है- विवेक चौबे की ✍ से

NEWSTODAY (गढ़वा) : यदि पर्व व त्योहारों की बात करें तो देश भर में अनगिनत पर्व व त्योहार मनाए जाते हैं। कई पर्व असत्य पर सत्य का विजय के प्रतीक मानते हुए मनाते हैं। ठीक उसी प्रकार होली भी असत्य पर सत्य का ही विजय का प्रतीक है,किंतु इसकी कथा कुछ अलग है। हर दुश्मनी को भुलाकर, दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाते हुए, गले से गला मिलकर खुशी का इजहार करते हुए लोग इस दिन रंग में रंग जाते हैं। यानी कि एकता के रंग में रंगना ही तो होली है। क्या बच्चे,क्या बूढ़े सबके सब इस दिन रंग में सराबोर होते दिखते हैं। इस दिन का नजारा कुछ अलग ही देखने को मिलता है। अपने से बड़ों के पैर पर अबीर-गुलाल डालकर, चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। वहीं मजकिया जैसे भाभी-साली को लोग रंग में सराबोर कर,होली का खूब मजे लेते हैं। रंग खेलने के दिन को धुलंडी व धूलि के नामों से भी जाना जाता है।

होलिका दहन का इतिहास

वहीं होली से पूर्व होलिका दहन का भी प्रचलन है। यह होली त्योहार का पहला दिन होता है। यह फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। प्राचीन विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी में मिले 16वीं शताब्दी के एक चित्र में होली पर्व का उल्लेख मिलता है। जबकि विंध्य पर्वतों के समीप रामगढ़ में मिले ईसा से 300 वर्ष पुराने अभिलेख में भी इसका उल्लेख मिलता है।

होलिका दहन की कथा

इस त्योहार को लेकर प्रहलाद, होलिका व हिरण्यकश्यप की कहानी काफी प्रचलित है। हिरणकश्यप एक दानवराज था। दानवों के राजा होने के कारण उसे अधिक घमंड था। वह चाहता था कि लोग उसे ही भगवान कहें।जबकि उसका पुत्र- प्रह्लाद भगवान विष्णु के अलावे किसी अन्य को भगवान कहने के लिए तैयार न था। इस पर उसे गुस्सा आ गया। उसकी बहन होलिका को ऐसा वरदान मिला था कि उसे अग्नि भी नहीं जला सकती थी। उसने होलिका को आदेश दिया की वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में जाए। वह अपने गोद मे लेकर प्रहलाद को अग्नि में चल गयी। किन्तु सोंच व समझ धरा के धरा ही रह गया। ऐसा उल्टा हो गया कि होलिका अग्नि में जलकर भस्म हो गई व भक्त प्रह्लाद बच गया। इसी घटना की याद में इस दिन होलिका दहन करने का विधान है।

और भी कई कहानियां प्रचलित है

होली की एक कहानी कामदेव की भी है। पार्वती शिव से विवाह करना चाहती थीं। तपस्या में लीन होने के कारण शिव का ध्यान उनकी तरफ गया ही नहीं। ऐसे में प्यार के देवता कामदेव आगे आए। उन्होंने शिव पर पुष्प बाण चलाया। तपस्या भंग होने से शिव को गुस्सा आ गया। उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी। उनके क्रोध की अग्नि में कामदेव भस्म हो गए। कामदेव के भस्म हो जाने पर उसकी पत्नी- रति रोने लगीं। शिव से कामदेव को जीवित करने की गुहार लगाने लगी। जब शिव का क्रोध शांत हुआ तो उन्होंने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया। कामदेव के भस्म होने के दिन होलिका जलाई जाती व उनके जीवित होने की खुशी में रंगों का त्योहार मनाया जाता है।

होलिका दहन तिथि व शुभ मुहूर्त

तिथि – 9 मार्च , सोमवार
पूर्णिमा तिथि का आरंभ – 9 मार्च को सुबह 03:03 मिनट से
पूर्णिमा तिथि का समापन – 9 मार्च को रात 11:17 मिनट तक
होलिका दहन का मुहूर्त – 9 मार्च शाम 06:26 मिनट से रात 08:52 मिनट तक

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